आज से अगर सौ साल पहले की बात की जाय तो कितने लोग लिखना पढ़ना जानते थे । अगर साक्षरता के सन्दर्भ में बात की जाय तो यह दर बमुश्किल दस का आंकडा भी पार नहीं कर पायेगा और उसमें भी इस छोटे हिस्से का बहुत बड़ा हिस्सा चंद शहरों और बाजारों में केंद्रित। साक्षर लोगों में भी कितने लोग काम चलाऊ बातों को छोड़ और कोई भी बात लिखने की सोच पातें होंगें । बहुत हुआ तो आई हुई चिठी का जबाब लिख दिया । जो थोडी साक्षरता थी उसका भी खेतिहर समाज में ठोस जातिगत और वर्गीय आधार था।
पढ़े लिखे लोगों में भी ज्यादा तर अपने साथ ही ,जमाने के गम और उल्लास को ,तारीख और सीख को ले कर इस दुनिया से रुखसत होते रहे .मानवता की अनमोल थातियाँ लुटती रहीं.
बाद के दिनों में साक्षरता और शिक्षा के प्रचार प्रसार के नए दौर में अगर किसी ने लिखने के लिए अपने संकोच पर काबू भी किया तो उस लिखे का वो क्या करे। पत्र पत्रिकायों में अपने लिखे को छपवा पाने की विधा को साधना सब के लिए आसान नहीं था।
हाँ इन्टरनेट की नयी विधा ने अब यह मुमकिन किया है की अगर आप संकोच की बाधा को पार करें तो एक प्लेटफोर्म उपलब्ध है।
कल्पना करें की १७ वीं सदी में भोजपुर , अवध या बुंदेलखंड का किसान अपनी आप बीती और जगबीती , अपने गाँव में बैठा लिख रहा होता । १७६४ में चौसा के मैदान में लड़ी जा रही लडाई को लिर्लिप्त भाव से देखने वाला किसान , चंपारण में नील की खेती मज़बूरी में करने वाला किसान ,गिरमिटिया मजदूर बन कर पनिया के जहाज से कलकत्ता जाता हुआ , क्या सोच रहा होगा ? अगर कोई ऐसा यन्त्र हो जिससे उनके दिल-ओ -दिमाग में घुस ना मुमकिन हो तो तारीख के उस दौर की कैसी दिलचस्प जानकारी मिल जाय । क्या यह आप को भी रोमांचित करता है ?
Friday, January 30, 2009
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रोमांचित तो करता है.
ReplyDeleteआपने अभी अभी सोचा इसके बारे में.....कल शायद सच हो जाए और वह यंत्र बन जाए।
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