ब्लॉग जगत में वीरू आप सादर आमंत्रित हैं। वो तमाम लोग जो आप की सोह्वत में रहें हैं वो कसम खा कर यह कहें गें की आप वाचिक परम्परा के बेजोड़ खिलाड़ी हैं। लेकिन वाचिक परम्परा की अपनी सीमायें हैं .लुत्फ़ उठाने के लिए सशरीर मौका -ऐ - गुफ्तगू पर हाजिर रहना होता है।
इस ब्लॉग पर कुछ आप बीती और कुछ जगबीती सुनाएँ .आप बीती की तो भरी गठरी है ही आपके पास ,जगबीती की भी अद्यत्तन जानकारी है।
आईये , और इसमें शरीक होकर अपना और अपने मित्रों शागिर्दों और तमाम पाठकों को सोचने ,समझने और आनंदित होने का अवसर दें।
Friday, January 30, 2009
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kha
ReplyDeleteइस आमंत्रण के लिए मित्र कौशल को कोटिशः साधुवाद. आमंत्रण के साथ जिस लेखकीय सक्रियता की गुजारिश मुझसे की गयी है, उसकी पात्रता मुझमें कितनी है मैं कह नहीं सकता. मैं स्वीकारता हूँ कि ब्लॉग की दुनिया बौद्धिक विमर्श के लिए तमाम नयी संभावनायों के द्वार खोलने में सार्थक है. कोशिश जरूर करूंगा कि मित्र की पुनीत अपेक्षाओं के अनुरूप कुछ लिखता रहूँ, किंतु नीयत और नियति के धर्मसंकट का क्या करुँ? जानता हूँ कि ऐसे तर्क से मित्र कौशल बिदक जायेंगे और वैकल्पिक तर्क प्रणाली की भरी गठरी के ज़ोर पर मेरे ऊपर निष्क्रियता का आरोप मढ़ देंगे. लेकिन, मैं ऐसा इसबार हरगिज़ न होने दूँगा. भरोसा दिलाता हूँ कि इस ब्लॉग के माध्यम से मैं लगातार आपको आपबीती और जगबीती के बारे में कुछ सुनता-सुनाता रहूँगा. श्रीगणेश के साथ इतना ही.
ReplyDeleteवीरेंद्र
आप को मैं यहाँ तक खीच लाया मुझे ताजुब हो रहा है.शेक्स्पीअर ने अपनी एक रचना में प्रेम और नादानी के बारे में लिखा है की " even though i was untutored in the ways of love but i was sincere and honest with the love ." (quoted from memory with due apology to the ग्रेट english bard).
ReplyDeleteनियति और नियात अल्लाह जाने .
बाकि सब मैं वीरू पर छोड़ देता हूँ.
प्रयास महत्वपूर्ण है संशय और हिचकिचाहट के पार जाना है.
कोशिस करेंगें तो उम्दा और ठहाकेदार होगा . यह तय है.
कौशल